Banjara poem (लघु बंजारा कविता)

जो शान से जीता है शान से मरता है
वो ही असल  में  बंजारा कहलाता है
उड़ा के हर  फिक्र जिंदगी की धुए में
जो पग  पग  पर  डेरे जमाते रहता है
वो ही  असल  में बंजारा कहलाता है

जिसे डर  नहीं  किसी  भी रास्ते का
बिना  मंजिलों  के  चलता  रहता  है
जिसका  घर  ना  ठिकाना  होता  है
वो ही असल  में बंजारा कहलाता है

एक छोटी सी कविता,,,,,
      अब नहीं देना है किसी को अपना हक नहीं जीना है किसी के सहारे अब। चलो एक नई शुरुआत करते हैं,
नहीं करेंगे मतदान किसी के कहने पर चलिए खुद को नियम बद्व करते हैं।
क्यों जीना किसी के सहारे अब हम भी सक्षम हैं यह सिद्ध करते हैं।
चलो आज नई शुरुआत करते हैं ।। 🙏🏼🙏🏼
                 मयंक बंजारा।।



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